बहुत समय पहले बिल्कुल शुरुआत में समय से भी पहले कुछ नहीं था । शिवाय परमात्मा के
ना चांद, ना तारे , ना सूर्य कुछ भी नहीं।
ना मनुष्य थे ना पशु, पक्षी, जानवर , पेड़ पौधे कुछ भी नहीं केवल उस परमात्मा की अलावा ।
वह परमात्मा प्रेम का अलौकिक प्रकाशमय सागर था
उस विशाल सागर में नूर की लाखो करोड़ों बूंदे थी ।
जो गहरी नींद म सोई हुई थी।
क्योंकि वो सो रही थी , इससे उन्हें ये पता ही नहीं था कि परमात्मा कितना भव्य और प्रकाशवान है।
हर एक बूंद उस अथाह सागर की परमात्मा के स्वरूप क एक छोटा सा अंश थी।
नूर की हर नन्ही बूंद आत्मा कहलाई ।
तुम भी उन नन्ही बूंदों म से एक हो।।।।