गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर, गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:
अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है. ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं.
यह श्लोक मात्र एक भाव है और कुछ नही
भाव ... यह एक प्रकार का पारस पत्थर है
जो एक पत्थर को भी भगवान बना देता है और एक मनुष्य को परब्रह्म ...
जिस प्रकार एक मूर्ती बस प्रतिक मात्र है उस आदि शक्ति जगत जननी माँ तारा का
उसी प्रकार गुरु भी प्रतिक मात्र है उस परब्रह्म रूपी सच्चिदानन्द शिव का
हम मूर्ती लाते है
प्राणप्रतिष्ठा होती है (ऐसी भावना करना की भगवती इस विग्रह में आ चुकी है )
फिर
उस विग्रह को हम साक्षात् मानकर पूजते है
भोग लगाते है
और कुछ देर बाद उस विग्रह को नदी में विसर्जन कर देते है
यदि वह विग्रह ही भगवती होती तो हम विसर्जन कदापि नही करते
और
गुरु भी यदि साक्षात् परब्रह्म होते तो वेह कभी मृत्यु को प्राप्त नही होते
गुरु तो बस एक आधार है उस परब्रह्म का .. एक प्रतिक है ... स्वम् नही
यह बात मैं उन तथाकथित गुरुओं को कह रहा हूँ
जो
स्वम् को पूज्य मानते है
उस परब्रह्म के रूप में पूजवाते है
यह गलत है
क्योंकि
मनुष्य में कोई न कोई कमी अवस्य ही होगी
और इसी कमी के कारण मनुष्य कभी साक्षात् परब्रह्म नही हो सकते ..
गुरु परब्रह्म का प्रतिक है शिव का प्रतिक है .. विष्णु ब्रह्मा के भी प्रतिक है .. साक्षात् नही
जिस प्रकार विग्रह का विसर्जन होता है ठीक उसी प्रकार मानव देह धरी उस परब्रह्म का भी विसर्जन आवस्यक है
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गुरुपूर्णिमा की पूर्व संध्या की हार्दिक शुभकामनाएं
परम पूज्य गुरुजनों के चरणों में वंदन प्रणाम