“मैं और मेरी एक नयी दोस्त (जो मुझे मँसूरी में मिली थी, और दोस्त बन गयी), देहरादून के भगवान बुद्ध के मन्दिर को जा रहे थे। तभी अचानक तीन लड़कियों ने मेरी दोस्त का नाम चिल्लाया।
वो पीछे मुड़ी, उफ, यह लड़कियाँ तो उसकी देहरादून की तिब्बती दोस्त थीं, जो कि उसके साथ कॉलेज में पढ़ती थीं।
वो सबसे गले लगी और तीनों से मेरा भी परिचय कराया।
उन तीनों लड़कियों में से एक लड़की जो अपने लम्बे बालों को सही कर रही थी, मुझे बहुत खूबसूरत लगी। वो मुझे इतनी ज्यादा खूबसूरत लगी कि मैं उसकी खूबसूरती में एकदम खो गया, और देहरादून की खूबसूरती को भूलकर, एकटक बस उसे ही देखता रहा।
देहरादून से वापस आते समय उसकी खूबसूरती को मैंने एक गोरे कागज पर उतारने की नाकाम कोशिश की।
“एक लड़की, जो दिखने में नेपाली थी;
होंठ लाल, गोरे गाल और लम्बे बालों वाली थी।
जब मैंने उसको देखा, तो दिल को ऐतबार हुआ;
देहरादून की असली खूबसूरती का एहसास हुआ।
उसकी बोली में कुछ अलग ही मिठास थी;
उसके चलने का अन्दाज कुछ निराला था।
उसका लोगों से मिलने का तरीका बड़ा ही प्यारा था;
उसका शरमा कर मुस्कुराने वाला एहसास बाँवला करने वाला था।
मेरी आँखें उसके खूबसूरत चेहरे पर टिकी थीं;
लेकिन वो मुझे कुछ ज्यादा भाव नहीं दे रही थी।
उसने अपनी रेशमी जुल्फों को सँभालना शुरू किया;
उसे देखते ही देखते मैंने भी अपने लम्बे बालों पर हाँथ फेर दिया।
वो जा रही थी, क्योंकि ये चन्द लम्हों की मुलाकात थी;
मैं उसे मुड़-मुड़ कर देख रहा था, क्योंकि उसे छोड़ना नहीं चाहता था।
पता नहीं अब वह फिर से मिलेगी भी या नहीं;
लेकिन कुछ भी हो, वह मेरे दिल को छू गयी थी।
यूँ ही मिल जाते हैं, बहुत से अजनबी राहों में;
पर दिल को छूने वाले बहुत कम ही होते हैं।
अजनबी से अपना बनाना भी बहुत अजीब होता है;
पर हर मिलने वाला अजनबी, अपना कहाँ बन पाता है।“