भारत में कत्लखानों का प्रबल विरोध
लंबे समय से भारतवर्ष में गौ-हत्या के खिलाफ अभियान चलाये जा रहे हैं और इसका सबसे प्रबल समाधान कत्लखानों को प्रतिबंधित करना समझा जाता रहा है। इसी कारण कत्लखानों को बंद करने के लिए कई अभियान चलाये गए और अभी भी चलाये जा रहे हैं।
राजनितिक स्तर पर भी ये संघर्ष भारतीय राजनेताओं को अपने पक्ष में करने में सफल रहा है। अतः राजनितिक स्तर पर भी गौ-रक्षा हेतु गौ-वध को प्रतिबंधित करने संबंधी कई निर्णय लिए गए।
अनेक आंदोलनों, विरोध-प्रदर्शनों आदि के अलावा ये मुद्दा अनेक बार न्यायलयों में भी पहुंचा और कई विधि-विशेषज्ञों ने भी जबरदस्त वकालत कर न्यायालयों को भी इस प्रकार के आदेश पारित करने पर विवश किया।
परिणामवश, आज अधिकाँश भारतीय राज्यों में गौ-वध को प्रतिबंधित करने बाबत कोई न कोई कानून भी बना हुआ है।
परंतु क्या गाय अपनी जान बचा पायेगी?
इतने प्रयासों के बावजूद आज भी गौ-हत्या और गौ-तस्करी बदस्तूर जारी है। इस संबंध में मैं आपसे ये पूछना चाहूँगा कि इस विषय पर आपकी क्या राय है?
- क्या ये प्रयास अंश मात्र भी गौ-हत्या को रोकने में सफल हुए हैं?
- क्या कत्लखानों या बूचडखानों पर प्रतिबन्ध गौ-हत्या रोकने हेतु उचित उपाय है या हम समस्या को ठीक से समझ ही नहीं पा रहे हैं?
- क्या गौ-हत्या प्रतिबंधित करने से जीव-हिंसा रूक सकती है?
- गौ-हत्या बंद करने का निर्णय किसी धर्म-विशेष से प्रभावित हो लिया जा रहा है या फिर अहिंसा के नैतिक मूल्यों को आधार बना कर लिया जा रहा है?
- अगर अहिंसा के सिद्धांत का अनुकरण करना मूल ध्येय है तो सिर्फ गौ पर ही इतना आग्रह क्यों? क्या भैंस, बैल, बकरा, भेड़, मुर्गा, सुअर जैसे अन्य प्राणी जीना नहीं चाहते अथवा उनके जीवन का मोल कमतर है?
आप सभी प्रबुद्ध पाठक मुझे अपने विचारों से अवश्य अवगत करें
मैं एक अन्य पोस्ट में ठोस तथ्यों के आधार पर ये समझाने का प्रयास करूँगा कि कत्लखानों पर रोक लगाना समस्या का समाधान नहीं अपितु अधिक गंभीर समस्या खड़ी करना है। लेकिन उससे पहले मैं आपके विचार भी जानना चाहता हूँ कि कत्लखानों को प्रतिबंधित करने की प्रचलित मान्यता से आप कितना सहमत हैं। मुझे आपके मत और विचारों का इंतजार रहेगा।