एक चीनी ने परितोष को ईमानदारी के बारे में जो कुछ बताया, वह उसके लिए आँखे खोलने वाला था
एक दिन परितोष को उसके मैनेजर ने एक नए प्रोजेक्ट के लिए चीन जाने को कहा। वहां उसकी एक बैठक शंघाई में थी और दूसरी बीजिंग में। शंघाई की बैठक ख़त्म करने के बाद उनसे तय किया कि वह सुपरफास्ट ट्रैन से यात्रा का भी अनुभव लेगा।
शंघाई स्टेशन पर उसने देखा की वहां की भारत की तरह अंदर जाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक दरवाजे लगे हुए हैं और उनके आगे लंबी-लंबी कतारें लगी हुए हैं। ऐसे ही दरवाजे उनसे दिल्ली मेट्रो में भी देखे थे। बस कार्ड या चिप लगाओ और वह एक आदमी को पास देने के लिए खुल जाता था।
परितोष भी कार्ड बनवाकर कतार में लग गया। तभी उसका ध्यान एक ऐसे दरवाजे पर गया, जो खुला था और उसके बगल में एक बोर्ड पर चीनी भाषा में कुछ लिखा था। वहां कोई सुरक्षा गार्ड भी नहीं था। इसके बावजूद उस दरवाजे से कोई नहीं जा रहा था। परितोष ने एक सज्जन से पूछा की यह दरवाजा कहां ले जाता है?
सज्जन बोले, जहां बाकी दरवाजे ले जाते हैं। पारितोष ने पूछा, तो फिर लोग उससे क्योँ नहीं जा रहे ? सज्जन बोले, ये दरवाजा उनके लिए है, जिनके पास यात्रा करने के लिए पैसे नहीं हैं। पारितोष ने हैरान पारितोष ने हैरान होकर उस व्यक्ति से कहा, क्या आप वाकई सच बोल रहे हैं? यहां कोई ऐसा व्यक्ति भी नहीं है, जिससे मैं पुछु की ये सच है या गलत।
वह सज्जन बोले, हमारे सच और झूठ का फैसला कोई और क्योँ करे ? वो तो हमें खुद हो तय करना है। कुछ पलों के लिए पारितोष एक दम खामोश रह गया । फिर वह बोला, लेकिन ये तो बेवकूफी है। अगर दरवाजा खुला है, तो कोई क्योँ नहीं जाना चाहेगा। क्योँ व्यथ पैसे खर्च करेगा ? वह सज्जन बोले , ये तो आपके जमीर को तय करना है।
अब पारितोष ने विनम्र होकर उस व्यक्ति से कहा , माफ़ कीजियेगा, में ही आपकी बातों को गलत समझ रहा था।
ईमानदारी खुद के प्रति होनी चाहिए, दुसरो को दिखने के लिए नहीं।
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