वो ज़माने थोड़े अजीब थे, तब पॉकेट मनी का कांसेप्ट नहीं था, बल्कि कोई मनी थी ही नहीं. पापा से पैसा मांगने पर कई बार बेल्टों का सामना करना पड़ा था इसलिए निराश होकर जब आठवीं क्लास में था तब सोचा कि अपना बिजनेस शुरू करूंगा और करोड़पति बनूँगा.
कई महीने इंतजार के बाद जब गुल्लक में 77 रुपये इकट्ठे हुए, तब पड़ोस के सब्जी वाले अंकल के बिजनेस का ब्लूप्रिंट चुराया और उन्हीं के साथ अगली सुबह 4 बजे सब्जी मंडी पहुँच गया. सब्जीवाले के पूछने पर मैंने बताया कि स्कूल जाकर कोई अमीर नहीं बना आजतक, मुझे कमसिन उम्र में व्यापारी बनना है, मेरे जोश को देखकर उन्होंने तथास्तु कहा. सब्जी मंडी से मैंने 77 रुपये की हरी मिर्च यह सोचकर खरीदी कि अब मुझे धीरुभाई बनने से कोई नहीं रोक सकता.
घर के पास स्थित सब्जी मंडी में मैंने भी पापा के तकिये के कवर पर हरी मिर्च बिखेरकर अपना स्टार्टअप शुरू कर दिया. मेरा अनुमान था कि यह माल 200 में बिकेगा और 133 का प्योर प्रॉफिट होगा. दूसरी तरफ सुबह से सर्च एंड रेस्क्यू अभियान पर निकले मेरे घरवालों ने जब मुझे सब्जी मंडी में हरी मिर्च बेचते पाया तो पापा ने मुझे चोकस्लैम मारकर वहीँ मूर्छित कर दिया. तो इस प्रकार इको-फ्रेंडली बिजनेस को मारपीट में बदल गया.
सब्जी मंडी में हुई मेरी सर्विस के बाद जब मुझे घरवालों ने घर लाकर फेंका और मेरे बिजनेसमेन बनने की चुल्ल के बारे में पूछा, जवाब देने पर मुझपर सर्जिकल स्ट्राइक करी गयी. अगली सुबह जब आग ठंडी हुई तब मैंने कैलकुलेटर पर गिना तो पता चला 77 रुपये की लागत पर 60 रुपये का माल बिका, मतलब -17 रूपये का विशुद्ध घाटा.
पापा ने पूछा “तुझे ये घटिया आईडिया किसने दिया?”, उनकी मार से बचने के लिए मैंने सब्जी वाले अंकल का नाम बताया, शाम को 2 पैग लगाने के बाद पापा ने सब्जी वाले अंकल को कमुरा लॉक लगाकर नोकआउट कर दिया. मुझे बुरा तो लगा सब्जी वाले को पिटते देख लेकिन मजा भी बहुत आया.
इतनी मारपीट देखकर मैंने समझ लिया कि ऐसा कोई काम नहीं करना जिसमें जान जाने का जोखिम हो. तो मैंने पहली बार पैसे कमाएं नहीं बल्कि भविष्य में पैसे नहीं गंवाने की कला को सीखा.
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