दुनिया के ऐ मुसाफिर मंजिल तेरी कबर है ते कर रहा है जो तू दो दिन का यह सफर है दुनिया के ऐ मुसाफिर
दुनिया बनी है जब से लाखों-करोड़ों आए बाकी रहा न कोई मिट्टी में सब समाएं इस बात को ना भूलो सबका यह ही हसर है
दुनिया के ए मुसाफिर.
दुनिया के ऐ मुसाफिर मंजिल तेरी कबर है ते कर रहा है जो तू दो दिन का यह सफर है दुनिया के ऐ मुसाफिर
दुनिया बनी है जब से लाखों-करोड़ों आए बाकी रहा न कोई मिट्टी में सब समाएं इस बात को ना भूलो सबका यह ही हसर है
दुनिया के ए मुसाफिर.