एक कंपनी की कहानी, जिसने अपने कर्मचारी की संवेदना की परख के लिए अनूठा तरीका अपनाया।
बालदा हाउस उस दिन खचाखच भरा हुआ था। हो भी क्योँ न, आखिर कंपनी की पचासवीं सालगिरह जो थी। कंपनी एक किराये के कमरे से अब सौ करोड़ मूल्य की हो चुकी थी। इसी का जश्न मनाने के लिए कंपनी ने अपने सभी कर्मचारियों को बालदा हाउस बुलाया था।
उसी दिन कंपनी के नए मैनेजिंग डायरेक्टर का भी एलान होना था।ख़ुशी-ख़ुशी सभी लोग एक बड़े से हाल में प्रवेश कर रहे थे। लेकिन हॉल के ठीक बाहर एक फटा सा कंबल सिर पर ओढ़े एक भिकारी बैठा हुआ था, जो खुशनुमा माहौल का मज़ा किरकिरा कर रहा था। कोई उसे दुत्कार देता, तो कोई मुंह बनाकर वहां से चला जाता। कुछ ने तो उसे ठोकर भी मारा।
ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं था, जिसने उसकी तरफ गौर से देखा हो।कुछ देर मैं हॉल के दरवाजे बंद हो गए और कार्यक्रम की शुरुआत हुई। सरस्वती वंदना और कुछ नृत्य-नाटक के कार्यक्रम के बाद कंपनी के एक आला अधिकारी ने नए मैनेजिंग डायरेक्टर को मंच पर बुलाया। हॉल में एकदम सन्नाटा छाया था।
तभी पीछे से वह भिखारी मंच की तरफ बढ़ने लगा। सबकी नजरें उस भिखारी पर टिकी थी। लोग सोच रहे थे, क्या यही है नया मैनेजिंग डायरेक्टर। मंच पर आकर वह शख्स बोला, मेरा नाम है महेश शर्मा और में आपका नया मैनेजिंग डायरेक्टर हूं। वहां बैठे सारे कर्मचारी सकपका गए, क्योंकि उनमें से कई ने अभी थोड़ी देर पहले उसे दुत्कारा था, लातें मारी थी।
महेश बोले, मुझे पता है कि आप में से कई लोग सोच रहे होंगे की मेने ये वेशभूषा क्योँ धारण की? बस, दूसरे के प्रति आपकी संवेदना परखने के लिए। मैं आप सब से बस इतना कहूंगा, भले ही हमारे कर्म कोई न देख रहा हो, लेकिन उनका उत्तरदायित्व समाज और किसी अन्य व्यक्ति नहीं, बल्कि सिर्फ अपने आप के लिए होता है।
केवल वैसा ही कर्म कीजिए, जिसका आप खुद को उत्तर दे सके।
दोस्तों आजकी कहानी आपको कैसी लगी कृपया कमेंट मैं जरूर बताये। धन्यवाद् जय हिंद