कल की पोस्ट “जीवन और आचरण” भाग #२ से आगे शुरू करते है ----
अपना क्रूर तथा नीचतापूर्ण निर्णय ले लेने पर रानी ने एक दिन राजा से कहा –
“बहुत दिन हो गए, अपने कही घूमने नहीं गए, चलिए आज नदी किनारे भ्रमण हेतु चले ।”
राजा का मन सरल था । वह रानी की कुटिल भावना को समझ नहीं सका । उसने झट से स्वीकृति दे दी और वे जंगल की ओर चल पड़े ।
नदी का कगार ऊँचा था । वहां एक शिलाखण्ड पर वे दोनों बैठ गए । राजा नदी की जल-तरंगो को मग्न होकर निहारने लगा ।
अवसर देख रानी ने राजा को उस ऊँचे कगार से उफनकर बहती हुई नदी के जल में धकेल दिया ।
रानी मन ही मन प्रसन्न होती अपने घर आ गई ।
किन्तु राजा मरा नहीं । कोई लकड़ी का पटिया उसके हाथ आ गया और वह उसके सहारे स्वयं को डूबने से बचाता हुआ तिरता-तिरता दूर किसी नगर के घाट पर जा लगा । बहुत थक गया था वह । वहां नदी के जल में से निकलकर वह निकटस्थ किसी उद्धायन में सो गया ।
संयोग की बात है कि उस नगरी का राजा निस्संतान ही परमधाम को प्राप्त हुआ था । प्रश्न था कि अब राजा किसे बनाया जाए ? निर्णय हुआ कि राज-हस्तिनी की सुंड में पुष्प माला दी जाए । वह हस्तिनी जिस पुरुष के गले में माला पहना दे, उसे ही राजा बना दें ।
हस्तिनी मस्त चाल से चलते-चलते उसी उद्धायन की ओर आ निकली जिसमे थका हारा राजा जितशत्रु सो रहा था । हस्तिनी राजा के समीप आई और उसने वह पुष्पमाला उसके गले में पहना दी । राजा उठ बैठा । उस नगर के लोगों ने तथा समस्त मंत्रिमंडल ने उसका जयकार किया तथा उसे अपनी नगरी के राजपद पर प्रतिष्ठित कर दिया ।
समय सदैव करवट लेता रहा है । समय ने करवट ली और द्वार-द्वार भटकता फिरता किसी समय का राजा जितशत्रु, पुन: राजा बन गया । समय की इस करवट ने राजा जितशत्रु को भी बदल डाला था । अपनी रानी के पापपूर्ण तथा कपट भरे दुर्व्यवहार ने उसकी आँखें खोल दी थीं । वह अब जान चूका था कि अपने कर्तव्य-पथ से विचलित हो जाने के कैसे-कैसे दुष्परिणाम हो सकते है । अत: वह अब निष्ठापूर्वक, न्याय तथा संयमपूर्वक राज-काज देखने लगा तथा अपना जीवन-व्यवहार भी उसने दुराचरण से सदाचार की ओर मोड़ दिया । विषय-भोगों के विष का कड़वा स्वाद वह चख चूका था । जान चूका था कि ये विषय-भोग जीवन को पतन की ओर ले जाने वाले हैं । अस्तु, अब वह एक सदाचारी मानव तथा न्यायपरायण राजा बन गया था ।
आपको यह जिज्ञासा होगी कि उस रानी सुकुमालिका का क्या हुआ ? उसके पाप का फल उसे कैसे मिला ? पाप कर्म का कुफल तो मिला होगा यह सुनिश्चित है । तो आइये जानते है -
रानी और वह लंगड़ा आदमी कुछ समय तो भोग-विलास में डूबे रहे । किन्तु फिर धीरे-धीरे सारी धन-संपत्ति समाप्त हो गई । धन के समाप्त हो जाने पर उस रानी तथा उसके लंगड़े प्रेमी को पुन: रस्ते का भिखारी बन जाना पड़ा । अब रानी अपने प्रेमी को अपने कन्धों पर उठाए द्वार-द्वार भटकती फिरती थी । वे गीत गाते और भिक्षा मांगते थे । होते-होते एक नगर और एक-एक ग्राम से दुसरे नगर और दुसरे ग्राम चलते-चलते वे एक दिन उसी नगर में आ पहुँचे जहाँ राजा जितशत्रु राज्य कर रहा था । रानी गली-गली गाती फिर रही थी –
“एक पंगु भरतार.... ”
गीत के भाव ये थे कि मेरा भरतार पंगु है, मैं सीता सावित्री की भांति पवित्रतापुर्वक इसकी सेवा कर रही हूँ, आदि ।
रानी जब गाती-गाती राजमहल दे समीप से गुजर रही थी तब उसका स्वर राजा के कानों से भी जा टकराया । वह चौंक उठा । गवाक्ष में आकर उसने देखा और सुना – “एक पंगु भरतार.... ।”
राजा ने रानी को पहचान लिया । उसके चरित्र को तो वह पहले ही जान चूका था । घृणा और क्रोध उसके ह्रदय में भर आए । उसने सेवकों को भेजकर रानी को सभाभवन में बुलाया और कहा –
अपने पति की बाँहों का रुधिर पीने वाली, उसकी जंघा का मांस खाने वाली और उसे नदी में डुबो देने – बहा देने वाली तू विचित्र सती है ?
पोल खुल गई अथवा कहें कि सच्चाई समक्ष आ गई । झूठ अधिक समय टिक ही नहीं सकता । पाप का घड़ा एक-न-एक दिन फूटता ही है । सो फुट गया ।
रानी की तक़दीर को भी उसके दुष्कर्मों के कारण फूटना था । वह भी फुट गई ।
राजा ने उस दुश्चरित्र का सिर घुटवाकर, मुख पर कालिख पुतवाकर उसे अपने राज्य से बाहर निकलवा दिया ।
यही दुराचरण का परिणाम है । दुराचारिणी रानी को अपना राज, पति, राज्य, सम्मान और सहारा – सभी कुछ गवां देना पड़ा । एक शब्द में कहा जाए तो वह अपना सर्वस्व ही गंवा बैठी ।
अत: विचार कीजिए और निश्चय कीजिए कि अपने आचरण को सदैव शुद्ध रखेंगे । सदाचार के मार्ग का त्याग कभी न करेंगे । हमने आरम्भ में कहा था कि अपने जीवन का निर्माण कर लेना अथवा विनाश को आमंत्रण देना स्वयं हमारे हाथ में होता है । इस अवसर को व्यर्थ न जाने दीजिए । सदाचारी बनकर आत्मोन्नति की साधना कीजिए ।
इसी से जुडी पिछली पोस्टो का जुडाव है :-
https://steemit.com/@mehta/4adbj4
https://steemit.com/@mehta/5aiuqr
अब इसका चौथा और अंतिम अध्धाय अगली पोस्ट में जानेगें ।