छूकर के जब ऊंगलिया तुम्हरी
गुजरती है ज़िस्म पर से मेरे,
कितने ख्वाबो का खून कर जाती है ,
तुम नहीं जानते ,
तुम बस जानते हो अपनी प्यास को कैसे बुझाते हैं !!
भीड़ में लाखो की जब,
नजरे रुकती है , मुझ पर,
धीरे से गिर जाती हैं मेरे निर्वस्त्र अंग पर ,
तुम्हरी नजरो को तो शुकुन मिल जाता है,
मेरा मान खो जाता है
_प्रांशु