//नासूर//
जो खाँच बने कोरे कागज पे
लिखे नही है स्याही से,
वो दबे पड़े पिछले पन्ने पे
छिपे नही है राही से,
अभिमान नही सम्मान नही
इनकी कोई पहचान नही
क्या यही है गौरव भारत की
असहाय है ये,इन्सान नही?
सोच ऐ भारत! खोज के देख
क्या प्राणहीन है प्राण नही||
//नासूर//
जो खाँच बने कोरे कागज पे
लिखे नही है स्याही से,
वो दबे पड़े पिछले पन्ने पे
छिपे नही है राही से,
अभिमान नही सम्मान नही
इनकी कोई पहचान नही
क्या यही है गौरव भारत की
असहाय है ये,इन्सान नही?
सोच ऐ भारत! खोज के देख
क्या प्राणहीन है प्राण नही||