ग़ज़ल
कुछ दिन से ये लगता है बहुत शाद नहीं वो ।
दुश्मन की जो कर पाते हैं इमदाद नहीं वो ।
लगता है उन्हें क़ौम के हैं वो ही मसीहा ,
अल्लाह को करते जो कभी याद नहीं वो ।
जो लोग किया करते हैं लाशों पे सियासत ,
क्या तुमको भी लगता है कि जल्लाद नहीं वो ।
देते हैं सरेआम हुक़ूमत को वो गाली ,
उस पर ये शिक़ायत है कि आज़ाद नहीं वो ।
इस मुल्क़ के आइन में नहीं जिनकी अक़ीदत ,
इस मुल्क़ में रह पाएँगे आबाद नहीं वो ।
उनका कहीं ग़द्दारों से रिश्ता तो नहीं कुछ ,
देते हैं मेरे शे'रों पे जो दाद नहीं वो ।
'नादान' कहो उनसे कि ये ख़्वाब न देखें ,
इस मुल्क़ को कर पाएँगे बर्बाद नहीं वो ।
राकेश 'नादान'