बाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के सत्रहवें खंड में वेदवती की कहानी मिलती है। इसके अनुसार सीता पूर्वजन्म में लक्ष्मी का अवतार थीं और वे विष्णु को पाने के लिए हिमालय पर तप कर रही थीं। उनके सौंदर्य से अभिभूत रावण उन्हें पाने के लिए जबरदस्ती करता है तो वे खुद को बचाकर उसे श्राप देती हैं कि जल्द ही वे चमत्कारी जन्म लेकर उसे नष्ट करेंगी। इस कथा के कुछ भिन्न रूप श्रीमद् भागवत् पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी मिलते हैं। बाल्मीकि की दूसरी चमत्कारिक कथा में सीता को रावण के नाश हेतु अवतरित होते बताया गया है। ईसा के बाद की 9वीं शताब्दी से आगे तक न केवल भारत वरन् पड़ोसी देशों में भी प्रचलित मान्यता पर आधारित कहानी के अनुसार सीता रावण की पुत्री थीं। भारत, तिब्बत, खोटान, इंडोनेशिया, इंडोचीन आदि में इसका प्रचार हुआ। भारत में यह पहली बार जैन लेखक गुणभद रचित उत्तर पुराण में मिलती है।
इस कथा के कई रूप मिले। कुछ में उन्हें मंदोदरी से पैदा बताया गया है, जिसने यह जानकर कि बालिका उनके पति के नाश का कारण बनेगी, उसका त्याग कर दिया था। वह किसानों को मिली, जिन्होंने उसे राजा जनक को दे दिया। 18वीं शताब्दी की कश्मीरी रामायण में भी यहीं कथा मिलती है। जावनी सेरत कांड की कहानी मिलती-जुलती है, पर पालने वाले ऋ षि मेतिली बताए गए हैं। इस कथा में बालिका का नाम सिंता है। इसी समय की स्यामी रामायण में समुद्र में फेंकी गई बालिका को देवता उस दिशा में ले जाते हैं कि वह लंका से मिथिला पहुंचकर जनक को मिलती है। कंबोडिया की रामकथा में लंका से संबंध नहीं जोड़ा है। ये सारी कथाएं गुणभद से प्रेरित कही जा सकती हैं। अद्भुत रामायण के अनुसार सीता ऋ षियों के रक्त से जन्मीं और आनंद रामायण के अनुसार अग्नि से उत्पन्न हुई थीं।