धर्म शब्द बड़ा व्यापक है, लेकिन इसे बहुत ही संकीर्ण अर्थ में जनसामान्य द्वारा ग्रहण किया जाता है। अधिकतर लोग, तिलक, पाठ-पूजा, मन्दिर जाना,कीर्तन आदि को धर्म मानते हैं।
और बहुत से लोग तो यह भी कहते हैं कि-भैया! मैं तो नास्तिक हूँ, मैं धर्म-वर्म कुछ नहीं मानता और वह दसबीस हजार रुपया खर्च करके बच्चे के जन्मदिन पर हजार –पाँच सौ गरीब-अमीर लोगों का सत्संग हाल में लंगर या भण्डारा कराते हैं। ये सब धर्म कार्य करते हुए भी वे कहते हैं। ये कि मैं तो नास्तिक हूँ। मैं धर्म को नहीं मानता।
वास्तविकता ये है कि पाठ-पूजा, कीर्तन, मंदिर जाने तक ही वह धर्म की परिभाषा जानते हैं। लेकिन धर्म का वास्तविक अर्थ है कर्तव्य,ड्यूटी। और धर्म का स्वरूप हमारे स्वरूप के साथ-साथ बदल जाता है।
यदि हम एक फैक्टरी मालिक हैं तो हमार धर्म है अच्छी गुणवत्ता वाले प्रोडक्ट का उत्पा करवाना, कर्मचारियों को समय पर उचित वेतन देना |फैक्टरी में आने वाले ग्राहकों या सप्लायरों की बैठने की अच्छी व्यवस्था कर्मचारियों के हितों की रक्षा आदि-आदि- ये फैक्टरी मालिक का 'धर्म' है। भगवान् के सामने रोज अगरबत्ती जलाकर कर्मचारियों का खून चूसने वाला डुप्लीकेट माल बनाने वाला महा अधर्मी है। * यदि हम एक पिता हैं तो हमारा धर्म है अपनी सन्तान के दायित्वों को निष्ठापूर्वक पूरा करना हम एक नेता हैं तो अपने पद पर निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक देश हित का काम करना-यही हमारा है। * यदि हम धनवान हैं तो यथासम्भव निर्धनजन की सहायता करना हमारा धर्म है। | हम अपने इन धर्मों का पालन तो करें नहीं और ‘राम-राम जपना-पराया माल अपना करते रहें। तो हम पाखण्डी हैं। इसी प्रकार धर्म के हजारों - स्वरूप हैं।हर-एक का अपना-अपना धर्म है-वह यदि उसका पालन कर रहा है तो वह धार्मिक है। - और यदि धर्म का स्वरूप एक जैसा हो तो
कल्पना करो कि कोई एक ही काम धर्म हो और सब लोग उसी काम को करने लग जाय तो पुल कौन बनायेगा, मैट्रो को कौन ड्राइव करेगा।
ऑफिस में सारे क्लर्की करने लग जाय जो मैनेजर एवं चपड़ासी का काम कौन करेगा।
अतः धर्म का अर्थ-अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निष्ठा पूर्वक निभाना । और जो निभा रहा है, वह तिलक लगाये, न लगाये,कीर्तन करे, न करे-वह धार्मिक है। यह तो हुआ धर्म का लौकिक पक्ष । अब थोड़ा तात्विक पक्ष का भी चिन्तन करें।
जीव का तात्विक स्वरूप क्या है। बाह्य स्वरूप तो है कि वह एक फैक्टरी का मालिक है। और तात्विक स्वरूप है कि वह नित्य कृष्णदास है |जीवेर स्वरूप हय-नित्य कृष्ण दास।जैसे फैक्टरी मालिक के कुछ धर्म हैं। वैसे ही एक श्रीकृष्णदास का भी कुछ धर्म है। और ध्यान दीजिये वह धर्म नहीं वह धर्म का एक श्रेष्ठ स्तर है-उसे कहते हैं 'परमधर्म–स वै पुंसां परोधर्मः यतो भक्तिरधोक्षजे'-अर्थात्-पुरुषों (जीवों) का परमधर्म वह है जिसके द्वारा अधोक्षज भगवान् की भक्ति की जाती है। | भक्ति समस्त जीवों का परमधर्म है।लेकिन यह परमधर्म सभी को प्राप्त नहीं होता है।करोड़ों लोगों में से कोई एक होता है।जैसे एक विद्यालय में कक्षा-एक से पी-एच.डी.तक की पढ़ाई होती है, तो सब बच्चे पी-एच.डी.तक नहीं पहुँच पाते। कोई हाई स्कूल, कोई इण्टर करके छोड़ता जाता है। और आवश्यक भी है–यदि सभी पी-एच.डी. करते जाएँगे तो रिक्शा कौन चलायेगा ।चपरासी कौन बनेगा?
सृष्टि में हर वर्ग की जरूरत है। आज शूद्र या सफाईकर्मी ऑफिसर और डी एम बनते जा रहे हैं, परिणाम स्वरूप सफाई का कितना बुरा हाल है।एक समय आने वाला है कि काम की तलाश वाला कोई भी जाति का व्यक्ति सफाई का काम करेगा ।पहले बाल काटने का काम 'नाई जाति में उत्पन्न लोग ही करते थे। आज शर्मा ब्यूटी पार्लर व अरोड़ा ब्यूटी पार्लर में बाल काटने का काम किया जा रहा है। मैन्स पार्लर व सैलून भी नाइयों के अतिरिक्त अन्य लोगों की भी हैं।
अतः सर्वप्रथम अपने स्वरूप का निर्णय करना है कि मैं कौन हूँ।फिर यह निश्चय करना है कि मुझे 1.धर्मपालन करना है? 2.धन एकत्र करना है, 3. कामनाओं की पूर्ति करनी है, 4.जन्ममृत्यु से छूटना है या, 5. परमधर्म भगवान् की भक्ति करनी है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एवं प्रेम।
इनमें से कोई एक निश्चय करें फिर उसके धर्म और साधनों का पता करके उसमें लग जाएं हम। यह ध्यान रखना है कि ये निर्णय और विचार केवल अपने केवल एक अपने लिये लेना करना है।दूसरे के लिये नहीं । भक्ति करनी है तो तिलक लगाओ, दीक्षा लो, भजन करो, कीर्तन करो और रास्ते में कोई भी अड़चन आये उसे छोड़ते चलो। और श्रीकृष्ण चरणारविन्द प्राप्त कर लो।
कभी-कभी क्या प्रायः लौकिक धर्म व परमधर्म दोनों को निभाना पड़ता है तो अपने स्वरूप, रुचि उद्देश्य के अनुसार किसी एक को तनमन से निभाओ, दूसरे को बेमन से निभाओ और उससे निकलने का प्रयास करते हुए मुख्य काम में लग जाओ। | एक बात और भी देखी है-प्रभु-वैष्णव-गुरु कृपा से हमें किसी प्रकार जीवन के लक्ष्य का ज्ञान हो गया और हम भजन में लग गये तो हम भक्त बनाने की फैक्टरी खोलने का विचार करने लगते हैं। यह भटकने वाली बात है।
कुछ आचार्य, गोस्वामी, तेज सम्पन्न सन्तों में ये शक्ति हो सकती है।हम-आप अभी स्वयं ए बी सी डी के विद्यार्थी हैं और कॉलेज खोलने चले।
दूसरा यह भी दृढ़ता से हमें समझना है कि सभी लोगों की वृत्ति हमारी जैसी हो ही नहीं सकती। सब परम धर्म के अनुयायी नहीं हो सकते। एक सौ बीस करोड़ भारतीय एक पथ के अनुगामी नहीं हो सकते। सभी डॉक्टर बन जाय तो मरीज कौन होगा? और मरीज नहीं होगा तो डॉक्टर करेगा क्या? ऐसे ही सभी भक्त नहीं बन सकते।
गरीब नहीं होगा तो फैक्टरियों में काम कौन करेगा और अमीर नहीं होगा तो फैक्टरी लगाएगा कौन ।अतः तुम्हें यदि हीरा मिल गया है तो हल्ला मत करो । चुपचाप अन्तर्मुखी होकर उसका आनन्द लो।हाँ कोई आपके आनन्द से आकर्षित होकर तुमसे पूछे तो उसका उसके स्तर अनुसार समाधान करो । फैसो मत उसमें । | पूरी दुनिया क्या, पूरा नगर, पूरी कॉलोनी और तो और पूरा परिवार भी सहमत या एकमत नहीं हो सकता । मत अनंत हैं, धर्म अनंत हैंव्यक्ति के स्वरूप के अनुसार अनेकों हैं। अतः अपने स्वरूप का निर्धारण करके अपने धर्म का निर्धारण करो और उसमें लग जाओ और कहीं परमधर्म का ज्ञान हो जाये तो फिर कहना ही क्या?