विजयनगर के राजा कृष्णदेव ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उनके निर्लोभी होने की बात सुनी, तो वह आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने अपने मंत्री व्यासराम की सहायता से संत पुरंदर की परीक्षा लेने का निर्णय किया।
पुरंदर को दिए जाने वाले भिक्षा के चावलों में हीरे और रत्न मिलाकर करके दिए जाने लगे 1 महीने तक ऐसे ही चावला में हीरे के छोटे-छोटे टुकड़े डाल कर दिए जाते रहे महीने के अंत में राजा अपने मंत्री के साथ पुरंदर के घर जाकर उसकी परीक्षा लेने चला गया । वह वेश बदल कर गया था ।
वहां पहुंच कर वह घर के किनारे पर जाकर खड़ा हो गया पुरंदर के घर के अंदर उसके गरीब पत्नी पुरंदर से कह रही थी कि आजकल आप भिक्षा कहां से लेकर आते हैं चावलों में से बोहत कंकर निकलते हैं । मैं उन्हें चुनते-चुनते परेशान हो जाती हूं।' राजा को यह देश बड़ा ताज्जुब हुआ कि कोठरी के एक कोने में, जहां संत की पत्नी कूड़ा फेंकती थीं, वहां उनके द्वारा दिए गए हीरों का ढेर लगा हुआ था। संत पुरंदर ने राजा को पहचान लिया।
पुरंदर बोले महाराज मुझे पता था कि आप चावलों में हीरे मिलाकर देते हैं पर मुझे गरीब ब्राह्मण के लिए हीरे और कंकर एक समान है आप गांव में मीठे जल के कुएं बनवा दीजिए इसी में इन हीरो की सार्थकता है राजा और मंत्री पुरंदर की विरक्ति देखकर नतमस्तक हो गए ।