प्यास लगने पर ही पानी की कीमत का अहसास होता है। कोई विकल्प नहीं है इस प्राकृतिक संसाधन का। अमृत भी प्यासे का गला तर करने की सामथ्र्य नहीं रखता। ऐसे अनमोल प्राकृतिक संसाधन पानी की किल्लत अगर बारहमासी बन चुकी है तो इसके लिए हम सब जिम्मेदार हैं। जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल ही नहीं, हम सब पानी का अपव्यय करते हैं। हमारे दिलोदिमाग में यही बात घर कर गई है कि अकेले हमारे बचाने से क्या होगा? उस समय हम भूल जाते हैं कि बूंद-बूंद से ही सागर बनता है और अच्छी शुरुआत कहीं से और किसी से भी हो सकती है।
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