पेड़ को दीमक लग जाये या आदमजा़द को ग़म
दोनों ही को अमजद हमने बचते देखा कम
तारीकी के हाथ पे बैअत करने वालों का
सुरज की बस एक किरण से घट जाता है दम
रंगों को कलीयों में जीना कौन सिखाता है!
शबनम कैसे रुकना सीखी! तितली कैसे रम!
आँखों में ये पलने वाले ख़ाब ना बुझने पाउं
दिल के चांद चिराग़ की देखो लो ना हो मद्ध्म
हंस पड़ता है बहुत ज़्यादा ग़म में भी इंसां
बहुत ख़ुशी से भी तो आँखें हो जाती हैं नम