गाय को माँ कहने की चालबाज़ी
“माँ का दूध अपने बच्चे के लिए अमृत-तुल्य है” - यह एक निःसंदेहास्पद तथ्य है, एक निर्विवादित, सार्वभौमिक सत्य है। इस तथ्य का अनुचित लाभ उठाने के लिए गौ-पालकों ने गाय को “सबकी माँ” के रूप में प्रचारित किया और फिर उपरोक्त तथ्यानुसार उसके दूध को “अमृत” सिद्ध कर दिया। सदियों से, उपभोक्ताओं को इस विकृत किए गए कथन और अर्द्ध-सत्यात्मक तथ्य से भ्रमित किया जाता रहा है। उपभोक्ताओं को यह स्पष्ट समझना होगा कि गाय का दूध अमृत-तुल्य जरूर है, किन्तु वह अमृत-तुल्य उसके अपने बच्चों के लिए है, न कि आपके बच्चों के लिए। इसी प्रकार गाय एक “माँ” भी है, लेकिन उसके अपने बच्चों की, आपकी नहीं!
मासूम बछड़े को भी निगल जाता है दूध का व्यापार
दूध के लिए कराये गाय के प्रसव से अगर मादा-बछड़ा होता है तो उसका जीवन उसकी माँ की ही दर्दनाक कहानी को दोहराते हुए इस कुत्सित कुकर्म-युक्त क्रूर-जीवन को जीने के लिए बेबस होता है। नर-बछड़े को अपनी माँ के समान, उसके साथ बारबार किये जाने वाले बलात्कार की पीड़ादायक प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ता और न ही अपने नवजात बच्चों को अपनी ही आँखों के सामने से चुराये जाने से होने वाली विरह वेदना को झेलना पड़ता है, और न ही जीवन भर एक ही जगह खड़े-खड़े बड़ी मात्रा में दूध बनाने और विसर्जित करने से होने वाली पीड़ा को सहन करना पड़ता है।
लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि नर बछड़े को कुछ कम कष्ट सहन करने पड़ते हैं। उसका दुर्भाग्य भी कोई कम नहीं होता। पैदा होने के एक ही दिन बाद उसे बूचड़खाने के लिए जाने वाले ट्रकों में ठूंस दिया जाता है। यदि अगले ही दिन उसे भेजने की व्यवस्था नहीं हो पाती है तो उसके जबड़ो व नथुनों को धातु की कड़ी व नुकीली चूड़ी से बाँध दिया जाता है और कई स्थानों पर तो उसकी जीभ तक को काट दिया जाता है ताकि वह गलती से भी अपनी माँ का दूध नहीं पी पाए। पहचान के लिए चिह्नित करने के लिए 500 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गरम किये गए लोहे को कई सैकंडों तक उसके बदन से चिपका कर रखा जाता है। उसे बंधियाने के लिए उसके जननांगों की सर्जरी की जाती है। ये सब बिना किसी एनेस्थेसिया या दर्द-निवारक दवा के किया जाता है। इन प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद वह कई दिनों तक दर्द के मारे चीखता रहता है। उसे बमुश्किल जिंदा रखने मात्र अल्प भोजन दिया जाता है। इस तरह से कुपोषित बछड़ा चलने-फिरने तक में अक्षम हो जाता है। कुछ तो अपने पैरों पर खड़े भी नहीं रह पाते। उसे जानबूझकर कुछ दिनों के लिए भूखे रखा जाता है ताकि उसकी चमड़ी थोड़ी ढ़ीली पड़ जाए और आसानी से उतारी जा सके। इतना ही नहीं, इसके लिए उसे खौलते हुए पानी में भी डाला जाता है और बहुत ही उच्च तापमान की भाप में भी रखा जाता है, गर्म भट्टी में भूना भी जाता है। इसके बाद उसकी पिछली एक टांग से उसे ऊपर उठा सिर के बल उल्टा लटका दिया जाता है। फिर पेट में चीरें लगा सारा खून बहाया जाता है। (यह खून मनुष्य के लिए ‘ब्लड-पुडिंग’, ‘ब्लड-केक’, ‘ब्लड-सॉसेज’ और ‘ब्लड-कर्ड’ जैसे कई स्वादिष्ट व्यंजन बनाने के अतिरिक्त बेकरी और फार्मा उद्योग में भी काम आता है।) अब इसकी चमड़ी को उतारना शुरू होता है। ध्यान रहे अभी ये नवजात अपने पूरे होंशोहवास में होता है। (यद्यपि पशुओं को मारने के पहले पिस्तौल या बिजली के झटकों की सहायता से उन्हें निश्चेत करने के कई नियम-कानून बने हुए हैं, अक्सर उनका कड़ाई से पालन नहीं हो पाता है।) चमड़ी को उतारने के बाद भी अगर यह अपने प्राण नहीं त्यागता तो इसके माँस के लिए इसके प्राण भी हर लिए जाते हैं। पूरी प्रक्रिया इतनी खौफनाक होती है कि बछड़े की चीखों से सम्पूर्ण वातावरण गूँज उठता है। इन चीखों को सुनने मात्र से क़तार में बैठे अन्य बछड़े भय से थरथराने लगते हैं।
कुछ बछड़ों को कुछ माह जिंदा रख वील (माँस) के लिए मोटा-तगड़ा बनाया जाता है। परंतु इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी तब तक अच्छी देखभाल होती है। उसे बंज़र ज़मीन पर इस तरह बाँध कर रखा जाता है कि वे ज्यादा हिल-डुल न पाए। इससे उसके माँस को नरम और मुलायम रहने में मदद मिलती है। उसके माँस का रंग सफ़ेद बनाये रखने के लिए उसको बहुत कम लौह वाला पोषण दिया जाता है। इससे उनके शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास नहीं हो पाता और वे एनिमीया, डायरीया, न्यूमोनिया जैसे रोगों का शिकार हो जाते हैं।
हमारे देश में कुछ जगहों पर तो गायों और बछड़ों के झूंड को सैंकड़ों किलोमीटरों दूर स्थित बूचडखानों तक, बुरी तरह प्रताड़ित करते हुए पैदल ही हांक कर ले जाया जाता है। फिर वहाँ बेचने से पहले उनको कोपर सल्फेट जैसे रसायन पिलाये जाते हैं, जिससे इनका लिवर ही खराब हो जाता है। अतः पाचन की क्रिया बाधित हो जाने से इनका शरीर फुल कर मोटा और भारी हो जाता है, जो इनके अच्छे दाम दिलवाने के लिए काफी है!
कुछ राज्यों में छोटे से बछड़े को बूचडखाने को बेचने के विरुद्ध बने कानून और हमारी सामाजिक और धार्मिक आस्था के मद्देनज़र हमने अपनी सुविधा के लिए कई प्रकार के ‘सम्मानित’ वैकल्पिक रास्ते ईज़ाद किए हैं। जैसे कई जगह नर-बछड़ों को पास के मंदिरों में ‘दान’ कर दिया जाता है। मंदिर में उन्हें पालने-पौसने की व्यवस्था नहीं होती और वे अक्सर मंदिर के बाहर धूप में बंधे भूख-प्यास से ही मर जाते हैं। यहाँ से उनके कसाईघर ले जाने का आसान मार्ग भी खुल जाता है।
क्रमंश -3 अगली पोस्ट मे
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इसी श्रंखला में आगे पढ़ेंक्ष, इसका भागांश-2 :
प्रविष्टि – 11: माँसाहार से भी घिनौना शाकाहार -3
धन्यवाद!
सस्नेह,
आशुतोष निरवद्याचारी